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Tuesday, 21 April 2020

Monday, 20 April 2020

Saturday, 14 February 2015

परमपूज्य बापुंना सद्‌गुरुनारायणानन्दतीर्थसेवा ट्रस्टद्वारे (श्रीक्षेत्र औदुम्बर) दिल्या गेलेल्या सन्मानपत्राचा मराठीत अर्थ (Post in Marathi)

।। हरि: ॐ ।।
१४-०२-२०१५

परमपूज्य बापुंना सद्‌गुरुनारायणानन्दतीर्थसेवा ट्रस्टद्वारे (श्रीक्षेत्र औदुम्बर) दिल्या गेलेल्या सन्मानपत्राचा मराठीत अर्थ


सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध २०१३ साली दत्तक्षेत्र श्री औदुंबर येथे श्रीगुरु दत्तात्रेयदर्शनास गेले होते. त्यावेळी परमपूज्य बापुंना सद्‌गुरुनारायणानन्दतीर्थसेवा ट्रस्टद्वारे (दत्तक्षेत्र श्री औदुम्बर) दिले गेलेले सन्मानपत्र संस्कृत भाषेत आहे, त्या सन्मानपत्राचा मराठीत अर्थ यथामति देत आहे. चूकभूल द्यावी घ्यावी.

हरि: ॐ परमपूज्य बापुंना सद्‌गुरुनारायणानन्दतीर्थसेवा ट्रस्टद्वारे दिल्या गेलेल्या सन्मानपत्राचा अर्थ मराठीत असा आहे. नमो भगवते दत्तात्रेयाय। दिव्य भगवान श्रीदत्तात्रेयांच्या सान्निध्यात श्रीक्षेत्र औदुम्बर येथे सद्‌गुरु नारायणानन्दतीर्थस्वामीगुरुंच्या सन्निध आपल्या शुभ आगमनप्रसंगी हे सन्मानपत्र दिले जात आहे. (परमपूज्य बापूंच्या सन्मानार्थ सन्मानपत्रात म्हटलं आहे की) हे प्रचंड तेज:संपन्न, महान, समर्थ विभूते! आपल्याकडून अखंडपणे श्रद्धावानजनांच्या समाजासाठी निग्रह-अनुग्रह-शक्तिद्वारे केले जात असलेले उद्धारकार्य जनता जनार्दनाची सेवा या भावनेने केले जात आहे. आपण मानवरूपाने भूतलावर अवतरून अनिरुद्ध नामाने कीर्तिमान झाला आहात. आम्हां देहधारी मानवांसाठी आपले दर्शन होणे हे त्रिकालांचा उद्धार करणारे आहे. श्रद्धावानांचे कल्याण करण्याच्या आपल्या कार्यक्षेत्रात आपण ईश्वरीय लीला आणि अनेकविध गुणांनी शोभून दिसत आहात. आपले दिगन्त यश असेच सदैव आम्ही ऐकत रहावे. अशा प्रकारच्या ईश्वरीय रमणीय गुणगणांनी विभूषित असणाऱ्या आपणास ‘भक्तकामकल्पद्रुम' ,या पदवीने सन्मानित करण्यात येत आहे आणि मन:सामर्थ्यदाता परमपूज्य अनिरुद्ध बापूंच्या पूज्य चरणी आम्ही गौरवपुरस्काराने विभूषित असे हे सन्मानपत्र सादर अर्पण करत आहोत.
आपले सत्कृपाभिलाषी, विश्वस्त मंडळविकास जगदाळे सद्‌गुरुनारायणानन्दतीर्थसेवाट्रस्ट दत्तक्षेत्र, औदुम्बर, जिल्हा सांगली, महाराष्ट्र गौरवाध्यक्ष आत्माराम एन्‌. नाडकर्णी ऍटर्नी जनरल, सिनियर ऍडव्होकेट हायकोर्ट, गोवा बुधवार दिनांक 1 मे 2013

 * भक्तकामकल्पद्रुम- कल्पद्रुम म्हणजे कल्पवृक्ष. काम म्हणजे धर्ममर्यादेस, पावित्र्यास अनुसरून असणारा कामपुरुषार्थ. भक्तकामकल्पद्रुम म्हणजे भक्तांचा कामपुरुषार्थ पुरविणारा कल्पवृक्ष.

अंबज्ञोऽस्मि ।

 ।। हरि: ॐ ।।


Wednesday, 19 November 2014

Thursday, 6 November 2014

Ambadnya Yogi Banalo Rahun Bapu Paayi (Post in Marathi)



।। हरि: ॐ ।।
06-10-2014
अनिरुद्ध पौर्णिमा

अंबज्ञ योगी बनलो राहून बापुपायी



मातेसम नाही कोणी, आई ती फक्त आई
योगीचे फक्त आहेत बापु आणि मोठी आई

स्वार्थी जगामधे या निरपेक्ष प्रेम आई
प्रार्थी सदैव बाळाचे स्वस्तिक्षेम आई

मज वाढविण्यासाठी करी त्याग सर्वकाही
किती केले याची गणती स्वप्नीही करत नाही

भक्ताची भक्ती करतो असा देव तू गं आई
वसेच शब्दकोशी शाप तुझ्या कधीही

मजसाठी आटवीते स्वतःचे रक्त आई
वाहे उपाशी असूनि पान्हा जिचा ती आई

निघती कृतघ्न लेक, वात्सल्य तरीही वाही
मी कितीही घाण असलो तरी तीच जवळ घेई

पर्याय पर्यायासी मिळतील या जगीही
आईस पण कदापि पर्याय कुण्णी नाही

इतुकेच जाणतो मी सर्वस्व माझे आई
अंबज्ञ योगी बनलो राहून बापुपायी
-Dr. Yogindrasinh Joshi


Happy Birthday Bapu!
 I love you my Dad!


अंबज्ञोऽस्मि ।
 ।। हरि: ॐ ।।


Saturday, 1 November 2014

GunaSankeertan, The Epitome of ShreeSaiSatcharit

।। हरि: ॐ ।।

 01-11-2014

 GunaSankeertan, The Epitome of ShreeSaiSatcharit



Many different ways of Bhakti (Devotion) have been described in BhaktiMaarga. All Saints love to keep performing the Gunasankeertan (praising, chanting the attributes & glories with gratitude & love) of God.
Saint Tukaram says- God, I'll keep doing Gunasankeertan with pleasure. ShreeSaiSatcharit is nothing but the Gunasankeertan of Shirdi Sainath done by Hemadpant. Hemadpant has mentioned about the different ways of Bhakti in ShreeSaiSatcharit.
It is mentioned in ShreeSaiSatcharit that the intense & exclusive love of Shraddhavaan towards the Sadgurutattva is expressed in nine different processes or forms or modes or facets. These nine facets are called as Navavidha Bhakti & GunaSankeertan is one among them.
Praising, chanting the attributes & glories with gratitude & love is called as GunaSankeertan. It fills the devotee’s whole being and enables the devotee to open his heart and to accept the love of SadguruTattva more & more.
In GunaSankeertan , the elevation process of mind fastens & it acts as a cleaning out process, which eventually purifies the mind from unwanted tensions and emotions.
While doing GunaSankeertan, the devotee experiences the  actice presence of SadguruTattva & starts living a fearless joyful blessed life.
It is written in ShreeSaiSatcharit that in Kaliyuga, reciting the name and singing the praises of SadguruTattva is a simple means of salvation.

मग जो गाई वाडेंकोडें। माझें चरित्र माझे पावडे।
तयाचिया मी मागें पुढें। चोहींकडे उभाच।।
-श्रीसाईसच्चरित ३-१२
SaiNaath’s words explain the importance of GunaSankeertan.  He says, “Whoever sings my praises, I will bestow upon him the joy peace and contentment. Believe fully in this as the Truth.”

कोणी सत्कारपूर्वक अर्चन। कोणी करिती पादसंवाहन।
उत्कंठित झाले माझे मन। गुणसंकीर्तन करावे॥
श्रीसाईसच्चरित ३-२६
The word GunaSankeertan is used by Hemadpant in this verse of ShreeSaiSatcharit & the epitome of ShreeSaiSatcharit is GunaSankeertan.
GunaSankeertan can be done by anybody anytime & anywhere. It does not require any special skill. You don't have to follow any rules, regulations and restrictions.
So Let us be in the GunaSankeertan of SadguruTattva.
Hey Sadguru! I'm surrendering myself to you through GunaSankeertan. I'm sure that My Sadguru always take care of everything.
GunaSankeertan is the easiest way to be Ambadnya forever. Sadguru Shree Aniruddha! Bapu, You have lightened this path for me.
I'm Ambadnya! 
 

अंबज्ञोऽस्मि ।

 ।। हरि: ॐ ।।


Sunday, 26 October 2014

Wednesday, 22 October 2014

सहस्र तुलसीपत्र अर्चन विशेषांक (Post in Hindi)

॥ हरि: ॐ॥
२२-१०-२०१४

सहस्र तुलसीपत्र अर्चन विशेषांक

‘भक्ति और विज्ञान के परस्पर-समन्वय से सभी प्रकार की समस्याओं का सर्वथा निराकरण किया जा सकता है’, यह मूलमन्त्र मेरे सद्गुरु परमपूज्य श्री अनिरुद्धजी ने अर्थात् बापु ने (डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी, एम्. डी. मेडिसीन) अपने श्रद्धावान मित्रों को देकर अपने कार्य की नींव रखी। 



परमपूज्य बापुजी मुंबई में हर गुरुवार को मराठी में श्रीविष्णुसहस्रनाम पर और हिन्दी में ‘श्रीसाईसच्चरित’ पर प्रवचन करते हैं। आदिमाता चण्डिका की महिमा, चण्डिकाकुल एवं सद्गुरुतत्त्व की गरिमा बताने के साथ साथ वे हनुमानचलिसा, श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, रामायण आदि ग्रन्थों में से संदर्भ देते हुए मर्यादाशील भक्तिमार्ग पर चलते हुए गृहस्थी और परमार्थ को किस तरह सफल बनाना चाहिए, इस बात को बड़ी ही सरलता से समझाते हैं। 

वे ‘प्रत्यक्ष’ इस दैनिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं। दुनिया के रंगमंच की परिस्थिति का निरन्तर अध्ययन एवं चिन्तन करके परमपूज्य बापुजी ने ‘तृतीय महायुद्ध’ इस विषय पर ‘प्रत्यक्ष’ में प्रदीर्घ अग्रलेखमाला लिखी, जिसे आगे चलकर पुस्तक के रूप में (मराठी, हिन्दी और अँग्रेज़ी इन तीन भाषाओं में) प्रकाशित किया गया। 



जीवनसंग्राम में विजय प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मानव को जिस मनोबल की, कुशलता की, मार्गदर्शन की एवं परमेश्वरी कवच की ज़रूरत रहती है, वह सब कुछ उसे दिलानेवाला मार्ग है- श्रीरामदूत हनुमानजी के द्वारा दिग्दर्शित किया गया मर्यादापूर्ण भक्ति का मार्ग अर्थात् ‘सुन्दरकाण्ड मार्ग’। और सन्तश्रेष्ठ गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी द्वारा विरचित श्रीरामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड यह इसी स्वर्णिम मर्यादामार्ग को प्रकाशित करनेवाला भगवत्-प्रकाश है, यह बापुजी का विश्वास है। 

इसी सुन्दरकाण्ड मार्ग से सभी को भली भाँति परिचित कराने के उद्देश्य से बापुजी दैनिक पत्रिका ‘प्रत्यक्ष’ में ‘तुलसीपत्र’ यह अग्रलेखमाला लिख रहे हैं। इस अग्रलेखमाला का 1000वां लेख दिनांक 5 ङ्गरवरी 2014 को प्रकाशित हो चुका है। 

सब कुछ दिया! हमारे जीवन को सुंदर बनाने के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह सब कुछ बापू ने इस माध्यम से हमें दिया है। युद्ध करेंगे मेरे श्रीराम। समर्थ दत्तगुरु मूल आधार। मैं सैनिक वानर साचार। रावण मरेगा निश्चित ही॥ इस आप्तवाक्य का एक बार जब वानरसैनिक मनःपूर्वक स्वीकार करता है, तब उसी क्षण उसके जीवन में सुन्दरकाण्ड की शुरुआत हो जाती है। 

सुंदरकाण्ड की अग्रलेखमाला का अध्ययन करते समय हमारी मनश्चक्षुओं के सामने सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी का योद्धास्वरूप बार बार आता रहता है। श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रंथराज प्रथम खंड ‘सत्यप्रवेश’ में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध स्वयं अपने हस्ताक्षर सहित लिखते हैं- ‘मैं योद्धा हूँ और जो भी अपने प्रारब्ध के साथ युद्ध करना चाहता है, उन्हें युद्धकला सिखाना यह मेरा शौक है।’ 

 दुष्प्रारब्ध के खिलाफ़ युद्ध  करने की कला सिखाकर यह अग्रलेखमाला हमें श्रद्धावान वानरसैनिक बनाती है। प्रारब्ध के खिलाफ़ युद्ध करना बहुत ही कठिन है और इसीलिए सुन्दरकाण्ड को अपनाकर राजाराम की शरण में जाना यह हमारी ज़रूरत है। 

फिलहाल बापू वसुन्धरा पृथ्वी के इतिहास के बारे में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन कर रहे हैं। निंबुरावासियों की हवस के बारे में, वसुन्धरा पृथ्वी पर हुए उनके सहेतुक आगमन के बारे में, उनके कपट-कारस्तान के बारे में इस इतिहास के माध्यम से खुलासा हो रहा है। मुख्य तौर पर देखा जाये तो आज का मानव ऐसा क्यों है, उसके मन में होनेवाली देवसंकल्पना ऐसी क्यों है, उसके मन में उत्पन्न होने वाले भय का कारण क्या है, इस प्रकार के अनेक मुद्दों का स्पष्टीकरण इतिहास के इस अध्ययन से हो रहा है। 

मासिक कृपासिन्धु अक्टूबर 2014 के अंक को सहस्र तुलसीपत्र अर्चन विशेषांक के रूप में मराठी, हिन्दी और अँग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित किया गया रहा है। नवंबर 2014 में गुजराती भाषा में इस विशेषांक को प्रकाशित किया जायेगा। 

For more details, pl refer- 
http://aniruddhafriend-samirsinh.com/sahastra-tulasipatra-archan-visheshank-2/